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साक्षरता दिवस पर बांटे मास्क व शिक्षण सामाग्री

mount abu news
मास्क पहने बच्चे व शिक्षण सामाग्री वितरित करते दक्ष व वंशिका कोरी
12 - 09 - 2020      Social Welfare , Environment , Education

आबू पर्वत 8 सितम्बर ,पर्यावरण दिवस पर 13 वर्ष के दक्ष कोरी ने अपनी बहन वंशिका कोरी के साथ शिक्षा व कोविड 19 कोरोनावाइरस के प्रति जागरूकता जगाने के उद्देश्य से लोहे की रद्दी (लोखन भंगार) को एकत्रित कर बेचने वाले गरीब परिवारों मे बच्चों को स्लेट , चोक , पेंसिल , चार्ट व मास्क वितरित किए । दक्ष के अनुसार ये लोग प्लास्टिक को एकत्रित कर बेचते हैं जिससे उनकी रोज़ी रोटी तो चलती ही है साथ ही शहर भी प्लास्टिक मुक्त होता रहता हैं ।  



अच्छी परवरिश , अच्छी शिक्षा और उचित मार्गदर्शन से इंसान भले ही धनवान बने न बने लेकिन एक नेक , एक सम्मानजनक नागरिक अवश्य बनता है जो देश , समाज और प्रकृति की सुरक्षा व उन्नति मे विशेष योगदान करता है । आबू पर्वत निवासी मात्र 13 वर्ष के 'दक्ष कोरी' ने अपने नैतिक मूल्यों , उच्च शिक्षा व संस्कार की बदौलत कुछ ऐसा करने का संकल्प ले रखा है जिससे समाज मे मौजूद अशिक्षा , पर्यावरण हानी व प्रकृति के प्रति असंवेदनशीलता पर लगाम लगाई जा सके । 


आज के प्रतिस्पर्धात्मक माहौल मे जहां अभिभावक अपने बच्चों को श्रेष्ठ , होशियार व धनवान बनाने के प्रयास मे लगे हैं वहीं हमारे आस पास के पर्यावरण , गरीबी , अशिक्षा जैसी कुरीतियों पर कोई ध्यान नहीं देता । माता , पिता  व गुरुजनों के उचित मार्गदर्शन व स्वचेतना के चलते दक्ष आए दिन 'प्लास्टिक मुक्त आबू'  'वन्यजीव व पर्यावरण सुरक्षा' आदि अभियान चलाकर आबू पर्वत के पर्यटन स्थलों व जंगलों से अपने मित्रों व सहयोगियों के साथ लापरवाह लोगों द्वारा फेंकी गयी प्लास्टिक व काँच की बोतलें , ग्लास , पॉलिथीन आदि संग्रहीत कर प्रशासन की सहायता से निस्तारित करवाता है । 


इस दौड़ भाग , खतरे से भरे व सामाजिक दृष्टि से बहुत प्रतिष्ठित न माने जाने वाले काम से दक्ष को भौतिक रूप से तो कोई लाभ नहीं मिलता है लेकिन देश व समाज के लिए कुछ कर रहा हूँ , इस भाव से आत्मसंतोष और प्रोत्साहन अवश्य प्राप्त होता है जो की किसी भी भौतिक प्रतिफल से कहीं बढ़ कर है । 


इस लेख को लिखने के पीछे मेरा मुख्य उद्देश्य यह है की हम सभी दक्ष की भांति, यह प्रयास करें की हम हमारे आसपास के पर्यावरण , वन क्षेत्र के प्रति संवेदनशीलता अपनाए व उनमें  कचरा , बोतलें , प्लास्टिक आदि न फेंकें । यदि जंगल मे घूमने जाते हैं तो सारा कचरा किसी थेली मे डालकर वापस ले आयें और शहर मे स्थित किसी भी कचरेपात्र मे डाल दें , कम से कम काँच की बोतलें ना फोड़ें जिससे वन्यजीव घायल ना हों क्योंकि वे जूते चप्पल नहीं पहनते हैं । हमारी थोड़ी जागरूकता से हमारी आने वाली पुश्तों को स्वच्छ वन व पर्यावरण मिलने मे मदद मिलेगी । बच्चे बड़ों से ही सीखते हैं , उन्हें पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाना हमारा परम कर्तव्य है ।  

अर्बुद समय  -  उमेद सिंह राठौर

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