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संकल्पों पर निर्भर होती है सफलता

भारत के आध्यात्म से होगा विश्वकल्याण


माउंट आबू
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की संगठन की संयुक्त मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी डॉ. निर्मला दीदी ने कहा कि बाबा, त्याग, तपस्या व सेवा की उन महान विभूति ऐतिहासिक महापुरूषों में से एक थे जिन्होंने लोक कल्याणहित स्वयं की अथाह चल अचल संपति समेत अपने आपको न्योछावर कर दिया था। वे शनिवार को संगठन के साकार संस्थापक प्रजापिता ब्रह्मा बाबा की पुण्य तिथी के उपलक्ष्य में विश्व शांति व मानवीय एकता को लेकर चल रही साधना के अंतिम दिन अयोजित कार्यक्रम में ब्रह्मा बाबा के संस्मरण सुनाते हुए कही ।

उन्होंने बाबा के साथ के संस्मरण सुनाते हुए कहा कि आध्यात्म प्रधान देश भारत में प्राचीनकाल से ही विभिन्न तत्वदर्शी महापुरूषों ने जन्म लिया है। यहां की अध्यात्म प्रधानता से विश्व का कल्याण होगा। ब्रह्मा बाबा ने कहा था कि परमपिता निराकार परमात्मा के अवतरण की महान भारत भूमि से ही विश्व कल्याण होगा। तब से लेकर समूचे विश्व में ईश्वरीय संदेश देने का कार्य अनवरत रूप से चल रहा है।

संकल्पों पर निर्भर होती है सफलता

संयुक्त मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी बीके शशिप्रभा ने कहा कि ब्रह्मा बाबा का मानना था कि संसार के सभी कार्य संकल्पों की सफलता पर निर्भर हैं। यदि मनुष्य स्वयं पर विश्वास करने लग जाए तो उसके वैचारिक धरातल में जो भी संकल्प उत्पन्न होंगे उसे वह जब भी कार्य रूप में परिवर्तित करेगा तो सफलता निश्चित है।

कल्याणकारी सिद्ध हो रहे बाबा के महावाक्य

शिक्षा प्रभाग की उपाध्यक्ष राजयोगिनी बीके शीलू बहन ने कहा कि ब्रह्मा बाबा ने मानव कल्याण के लिए जो कार्य किए वे आज के परिवेश में स्टीक ही नहीं बल्कि अब कल्याण्कारी भी सिद्ध हो रहे हैं। जिसके परिणामस्वरूप समज में एक विशाल जनसमुदाय बाबा के पदचिन्हों पर चलते हुए स्वयं को गर्वोन्नत महसूस कर रहा है।

संजीवनी बूटी का कार्य करता है राजयोग का अभ्यास

वरिष्ठ राजयोग प्रशिक्षिका बीके सविता अरोड़ा ने कहा कि ध्यान योग, कर्मयोग व सहजराजयोग की वास्तविकता के प्रकाश से तनावग्रस्त मानवीय जीवन में सुख, शान्ति, आनंद का समावेश होता है। सहज राजयोग का अभ्यास एक संजीवनी बूटी की भांति कार्य करता है। इस अभ्यास से मनुष्य का चिंतन सकारात्मकता के साथ शुद्ध, सात्विक व लोक कल्याणकारी कार्यों को बढ़ावा देने वाली प्रवृत्तियों का पक्षधर हो जाता है। 

पाडंव भवन में हुआ था ब्रह्माबाबा का दाह संस्कार

18 जनवरी 1969 को प्रजापिता ब्रह्मा बाबा ने अपनी नश्वर देह का त्याग किया था। संस्था की तत्कालीन मुख्य प्रशासिका दिवंगत राजयोगिनी दादी प्रकाशमणि ने देश-विदेश में बाबा के देह त्याग की सूचना दी थी। जिस पर हजारों की संख्या में आए राजयोगी श्रद्धालूओं ने तीन दिन तक अखंड साधना की थी। जिसके बाद 21 जनवरी 1969 को ब्रह्मा बाबा का विधिविधानपूर्वक पाडंव भवन परिसर में ही दाह संस्कार किया गया था । दाह संस्कार के बाद ब्रह्मा बाबा की यादगार विश्व शांति की शिक्षाओं से सुसज्जित समाधिस्थल शांति स्तंभ स्थापित किया गया। जहां आज भी हर वर्ष लाखों की संख्या में देश विदेशों से राजयोगी श्रद्धालूगण आकर साधना करते हैं। जिस साधना की परिपाटी आज भी जारी है ।

दिन भर चली अखंड साधना

विश्व शांति की मनोकामना को लेकर सवेरे दो बजे से ही बड़ी संख्या में पांडव भवन के चारों धामों शांति स्तंभ, बाबा का कमरा, तपस्यास्थली कुटिया, हिस्ट्री हॉल में अखंड साधना चलती रही। देश-विदेशों से आए राजयोगी श्रद्धालूओं ने ईश्वरीय ज्ञान का मनन चिंतन करते हुए कर्मयोगी बनकर निरंतर साधना करने का संकल्प लिया।

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